कावड़ यात्रा क्या है
हर साल श्रावण मास में करोड़ो की तादाद में कांवडिये सुदूर स्थानों से आकर गंगा जल से भरी कांवड़ लेकर पदयात्रा करके अपने गांव वापस लौटते हैं इस यात्राको कांवड़ यात्रा बोला जाता है।
कांवड के माध्यम से जल की यात्रा का यह पर्व सृष्टि रूपी शिव की आराधना के लिए हैं।
इस क्रिया में श्रावण मास में लाखों की तादाद में कांवड़िये सुदूर स्थानों से पदयात्रा करके गंगा जल से भरी कांवड़ लेकर आते है और श्रावण की चतुर्दशी के दिन उस गंगा जल से शिव मंदिरों में शिव जी का अभिषेक किया जाता है।
इसके आधार पर, कांवड़ धार्मिक प्रदर्शनों की एक शैली को संदर्भित करता है, जहां से श्रद्धालु पवित्र गंगा नदी से पानी ले जाते हैं।
यद्यपि कांवड़ का ग्रंथों में एक संगठित उत्सव के रूप में उल्लेख नहीं है, लेकिन यह घटना निश्चित रूप से 19वीं सदी की शुरुआत में हुई होगी जब अंग्रेजी यात्रियों ने उत्तर भारतीय मैदानों में अपनी यात्रा के दौरान कई स्थानों पर कांवड़ तीर्थयात्रियों को देखा।
यह यात्रा 19 के दशक के उत्तरार्ध तक कुछ संतों और पुराने भक्तों द्वारा चलाया गया एक छोटा सा मामला हुआ करती थी, जब इसने लोकप्रियता हासिल करना शुरू कर दिया
इस में श्रद्धा कम और अंध विश्वास अधिक प्रतीत होता है
जैसे कि श्री शिवमद् देवी भागवत के 3 स्कंद पृष्ठ नम्बर 123 पर विष्णु जी माता दुर्गा जी से स्वयं कह रहे है कि " मैं, ब्रह्मा और शंकर आप की कृप्या से ही उत्पन्न हुऐ हैं और हमारा तो जन्म व मरण भी होता हैं!"
तो यहाँ विचार करने वाली बात है कि जब ब्रह्मा जी, विष्णु जी और शिव जी की जन्म व मृत्यु हो रही हैं तो उन्हें सुख कैसे हो सकता है?
और उनकी भक्ति करने वाले अनुयायी तो फिर कभी मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते तथा न ही कभी सुखी रह सकते!
उन्हें मिलने वाले सुख तो उनके प्रारब्ध में की गई भक्ति कमाई का ही परिणाम हैं!
अर्थात् कांवड़ ले जाने वाले श्रद्धालु केवल देखा देखी की भक्ति ही कर रहे हैं!
क्योंकि कांवड़ यात्रा के दौरान पुण्य कम और पाप ज्यादा लगते है!
गीता जी अध्याय 6 श्लोक 46 में भी कहा है कि "शास्त्र विरूद्ध साधना करने वाले कर्मयोगी से शास्त्रविद् योगी श्रेष्ठ है।
गीता जी अध्याय 4 श्लोक 33 व श्लोक 34
इसी प्रकार श्री शिव महापुराण पृष्ठ सं. 24 से 26 विद्ध्वेश्वर संहिता तथा पृष्ठ 110 अध्याय 9 रूद्र संहिता
में स्पष्ट प्रमाण है कि "पूर्ण परमात्मा कबीर जी ही पूजा के योग्य हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु, शिव जी तो नाशवान प्रभु है उनकी भक्ति पूर्ण मोक्षदायक नही है।"
आज संत रामपाल जी महाराज ही विश्व में एक मात्र पूर्ण संत है जो सर्व शास्त्रों, गीता जी, वेदों, पुराणों, उपनिषदों एवं पवित्र कुरान और पवित्र बाइबिल तथा श्री गुरु ग्रंथ साहब जी में छुपे हुए गुढ रहस्यों को सर्व मानव समाज को प्रोजेक्टर के माध्यम से समझा रहे हैं!
यदि आप भी संत रामपाल जी महाराज जी के सत्संग सुनना चाहते हैं तो अवश्य देखे 'साधना' टी.वी. चैनल शाम 7:30 बजे से!
http://www.jagatgururampal.org
हर साल श्रावण मास में करोड़ो की तादाद में कांवडिये सुदूर स्थानों से आकर गंगा जल से भरी कांवड़ लेकर पदयात्रा करके अपने गांव वापस लौटते हैं इस यात्राको कांवड़ यात्रा बोला जाता है।
कांवड के माध्यम से जल की यात्रा का यह पर्व सृष्टि रूपी शिव की आराधना के लिए हैं।
इस क्रिया में श्रावण मास में लाखों की तादाद में कांवड़िये सुदूर स्थानों से पदयात्रा करके गंगा जल से भरी कांवड़ लेकर आते है और श्रावण की चतुर्दशी के दिन उस गंगा जल से शिव मंदिरों में शिव जी का अभिषेक किया जाता है।
इसके आधार पर, कांवड़ धार्मिक प्रदर्शनों की एक शैली को संदर्भित करता है, जहां से श्रद्धालु पवित्र गंगा नदी से पानी ले जाते हैं।
यद्यपि कांवड़ का ग्रंथों में एक संगठित उत्सव के रूप में उल्लेख नहीं है, लेकिन यह घटना निश्चित रूप से 19वीं सदी की शुरुआत में हुई होगी जब अंग्रेजी यात्रियों ने उत्तर भारतीय मैदानों में अपनी यात्रा के दौरान कई स्थानों पर कांवड़ तीर्थयात्रियों को देखा।
यह यात्रा 19 के दशक के उत्तरार्ध तक कुछ संतों और पुराने भक्तों द्वारा चलाया गया एक छोटा सा मामला हुआ करती थी, जब इसने लोकप्रियता हासिल करना शुरू कर दिया
इस में श्रद्धा कम और अंध विश्वास अधिक प्रतीत होता है
जैसे कि श्री शिवमद् देवी भागवत के 3 स्कंद पृष्ठ नम्बर 123 पर विष्णु जी माता दुर्गा जी से स्वयं कह रहे है कि " मैं, ब्रह्मा और शंकर आप की कृप्या से ही उत्पन्न हुऐ हैं और हमारा तो जन्म व मरण भी होता हैं!"
तो यहाँ विचार करने वाली बात है कि जब ब्रह्मा जी, विष्णु जी और शिव जी की जन्म व मृत्यु हो रही हैं तो उन्हें सुख कैसे हो सकता है?
और उनकी भक्ति करने वाले अनुयायी तो फिर कभी मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते तथा न ही कभी सुखी रह सकते!
उन्हें मिलने वाले सुख तो उनके प्रारब्ध में की गई भक्ति कमाई का ही परिणाम हैं!
अर्थात् कांवड़ ले जाने वाले श्रद्धालु केवल देखा देखी की भक्ति ही कर रहे हैं!
क्योंकि कांवड़ यात्रा के दौरान पुण्य कम और पाप ज्यादा लगते है!
गीता जी अध्याय 6 श्लोक 46 में भी कहा है कि "शास्त्र विरूद्ध साधना करने वाले कर्मयोगी से शास्त्रविद् योगी श्रेष्ठ है।
गीता जी अध्याय 4 श्लोक 33 व श्लोक 34
इसी प्रकार श्री शिव महापुराण पृष्ठ सं. 24 से 26 विद्ध्वेश्वर संहिता तथा पृष्ठ 110 अध्याय 9 रूद्र संहिता
में स्पष्ट प्रमाण है कि "पूर्ण परमात्मा कबीर जी ही पूजा के योग्य हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु, शिव जी तो नाशवान प्रभु है उनकी भक्ति पूर्ण मोक्षदायक नही है।"
आज संत रामपाल जी महाराज ही विश्व में एक मात्र पूर्ण संत है जो सर्व शास्त्रों, गीता जी, वेदों, पुराणों, उपनिषदों एवं पवित्र कुरान और पवित्र बाइबिल तथा श्री गुरु ग्रंथ साहब जी में छुपे हुए गुढ रहस्यों को सर्व मानव समाज को प्रोजेक्टर के माध्यम से समझा रहे हैं!
यदि आप भी संत रामपाल जी महाराज जी के सत्संग सुनना चाहते हैं तो अवश्य देखे 'साधना' टी.वी. चैनल शाम 7:30 बजे से!
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